अध्याय 2: संन्यास के दार्शनिक आधार
परिचय
संन्यास केवल एक बाहरी आचरण या जीवनशैली नहीं है, बल्कि यह एक गहन दार्शनिक विचार पर आधारित है। भारतीय दर्शन के विभिन्न स्कूलों ने संन्यास को अपने-अपने दार्शनिक सिद्धांतों के आलोक में व्याख्यायित किया है। यह अध्याय संन्यास के मूल दार्शनिक आधारों को समझने का प्रयास करता है – विशेषकर अद्वैत वेदांत, द्वैत वेदांत, और अन्य महत्त्वपूर्ण दार्शनिक परंपराओं के संदर्भ में।
संन्यास का दार्शनिक आधार मुख्यतः तीन मूल सिद्धांतों पर निर्भर है: (1) मोक्ष (मुक्ति) का अवधारणा, (2) ब्रह्मा (परम सत्य) का ज्ञान, और (3) माया (भ्रम) और जगत् की प्रकृति की समझ। इन तीनों को समझे बिना संन्यास के दार्शनिक आधार को पूरी तरह समझना संभव नहीं है।
1. अद्वैत वेदांत और संन्यास
अद्वैत वेदांत, जिसकी व्यवस्थित स्थापना आदि शंकराचार्य (788-820 ईस्वी) ने की, संन्यास को ज्ञान योग के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का सर्वोच्च साधन मानता है। अद्वैत दर्शन का मूल सिद्धांत यह है कि ब्रह्मा ही एकमात्र वास्तविक तत्त्व है, और सब कुछ उसी से निकला है, सब कुछ ब्रह्मा ही है।
ब्रह्मा की अवधारणा
अद्वैत वेदांत में ब्रह्मा को निरुपाधि (बिना किसी विशेषता के), निर्विकार (बिना किसी परिवर्तन के), अनंत (सीमाहीन), और सच्चिदानंद (सत्य-चेतना-आनंद) के रूप में परिभाषित किया जाता है।¹ तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है:
“सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्। सो अश्नुते सर्वान् कामान्।।”²
अर्थात्: “ब्रह्मा सत्य, ज्ञान और अनंत है। जो इसे परम आकाश (आत्मा) में छिपा हुआ जानता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है।”
शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्मा को तीन तरीकों से समझा जा सकता है:
- निषेधात्मक रूप से (Neti Neti): जो कुछ भी भौतिक या सांसारिक है, वह ब्रह्मा नहीं है।
- सकारात्मक रूप से: ब्रह्मा सत्य, ज्ञान और आनंद है।
- साक्षी रूप में: ब्रह्मा सब कुछ का साक्षी है।
माया की अवधारणा
अद्वैत वेदांत में माया (संसार की शक्ति) को समझना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। माया न तो पूरी तरह सत्य है और न ही पूरी तरह असत्य। यह मिथ्या (भ्रम) है।³ जैसे रस्सी को अंधकार में सांप समझना माया का उदाहरण है – न तो सांप सत्य है और न ही रस्सी पूरी तरह असत्य है, बल्कि अज्ञान के कारण सांप का भ्रम हो गया है।
शंकराचार्य के अनुसार:
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। इति वेदांतवाक्यानां अर्थोऽयं विपरीयते।।”⁴
अर्थात्: “ब्रह्मा सत्य है, जगत् मिथ्या है, और जीव ब्रह्मा ही है – यही वेदांत के वाक्यों का अर्थ है।”
इस विवर्त वाद (Vivarta Vada) के सिद्धांत के अनुसार, जगत् ब्रह्मा का एक प्रकार का भ्रम या प्रतिबिंब है, न कि वास्तविक परिवर्तन।
संन्यास का महत्त्व
अद्वैत दर्शन में संन्यास का महत्त्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह माया के भ्रम से मुक्त होने का सबसे सीधा रास्ता है। जब व्यक्ति सांसारिक आसक्तियों का त्याग करता है, तो उसका मन शांत हो जाता है और वह आत्मा-ब्रह्मा के ज्ञान में लीन हो सकता है।
शंकराचार्य के प्रसिद्ध कार्य “विवेकचूडामणि” (ज्ञान का शिखर) में, जो संन्यास के गुणों और योग्यताओं के बारे में है, कहा गया है:
“न कुलीनता न विद्या न बुद्धिः कारणं तत्र अपरे। अपि सर्वे गुणाः संन्यासी सफलो भवति।।”⁵
अर्थात्: “संन्यास के लिए न तो कुल का महत्त्व है, न ही विद्या या बुद्धि ही एकमात्र कारण है। अन्य सभी गुण संन्यासी को सफल बनाने वाले हैं।”
2. द्वैत वेदांत और संन्यास
द्वैत वेदांत, जिसका प्रतिपादन माधवाचार्य (1238-1317 ईस्वी) ने किया, अद्वैत वेदांत से पूरी तरह भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। द्वैत दर्शन के अनुसार, आत्मा और ब्रह्मा (भगवान) सदा अलग-अलग हैं, और उनके बीच एक शाश्वत भेद है।⁶
द्वैत दर्शन में ब्रह्मा और आत्मा
द्वैत दर्शन के अनुसार, भगवान (कृष्ण या विष्णु) सर्वोच्च सत्ता हैं, और सभी आत्माएं उनके अंश (भाग) हैं।⁷ आत्मा कभी भी भगवान के समान नहीं हो सकती, बल्कि वह सदा भगवान से अलग और उनके अधीन है। यह संबंध मास्टर और सेवक के बीच का संबंध है।
माधव के ब्रह्मसूत्र भाष्य में कहा गया है:
“भगवान् परं ब्रह्म, सचिदानंद स्वरूप, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्। आत्मा तस्य अंशः, सेवकः, सर्वदा भेदयुक्तः।।”⁸
अर्थात्: “भगवान परब्रह्मा हैं, सत्य-चेतना-आनंद का स्वरूप, सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान्। आत्मा उनका अंश, सेवक, और सदा उनसे भिन्न है।”
संन्यास का अर्थ द्वैत में
द्वैत दर्शन में संन्यास का अर्थ आत्मा-ब्रह्मा की एकता का अनुभव नहीं है (जैसा अद्वैत में है), बल्कि यह भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और सेवा का भाव है। द्वैत के अनुसार, संन्यास एक ऐसी अवस्था है जहां जीव अपनी सभी इच्छाओं को भगवान की सेवा में लगा देता है।⁹
महामहिम माधव के अनुसार, संन्यासी को निम्नलिखित गुणों को धारण करना चाहिए:
- ईश्वर-भक्ति: भगवान के प्रति निरंतर भक्ति और श्रद्धा
- सेवा-भाव: दूसरों की सेवा भगवान की सेवा के रूप में करना
- दास्य-भाव: स्वयं को भगवान का सेवक मानना
- सर्वत्र भगवान-दर्शन: भगवान को सभी में देखना
द्वैत दर्शन में, प्रेम और भक्ति (भक्ति-रस) को संन्यास का केंद्रबिंदु माना जाता है।¹⁰
3. विशिष्टाद्वैत वेदांत और संन्यास
विशिष्टाद्वैत (विशेष अद्वैत) दर्शन, जिसकी स्थापना रामानुजाचार्य (1017-1137 ईस्वी) ने की, अद्वैत और द्वैत के बीच एक मध्य मार्ग प्रस्तुत करता है। रामानुज के अनुसार, ब्रह्मा और जगत्, ब्रह्मा और आत्मा एक हैं, किंतु एक विशेष संबंध में – जैसे आत्मा और शरीर का संबंध।¹¹
विशिष्टाद्वैत में संबंध
रामानुजाचार्य के अनुसार, जगत् और आत्माएं ब्रह्मा के शरीर के समान हैं। ब्रह्मा इस ब्रह्मांड का आत्मा है, और सभी कुछ (जगत् और आत्माएं) उसके शरीर का अंग हैं।१२
“परब्रह्मा शरीरात्मक संबंध से सर्वात्मा, सर्वेश्वर हैं। सर्व भूत भाविता निलयः सर्व भूत समुत्थितः।।”१३
(परब्रह्मा शरीर-आत्मा के सिद्धांत से सभी का आत्मा और सर्वेश्वर हैं।)
संन्यास में भक्ति की भूमिका
विशिष्टाद्वैत में संन्यास में भक्ति को अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। रामानुज के अनुसार, संन्यास का सर्वोच्च रूप भगवान के प्रति निर्भर भक्ति है। यह भक्ति ज्ञान और कर्म दोनों को अपने में समाहित करती है।
रामानुजाचार्य के अनुसार, मुक्ति के तीन मार्ग हैं:
- कर्म योग: कर्तव्य पालन के माध्यम से भक्ति
- ज्ञान योग: आत्मा-ब्रह्मा के संबंध को जानना
- भक्ति योग: भगवान के प्रति निरंतर प्रेम
विशिष्टाद्वैत में संन्यास इन तीनों का संतुलित रूप है, जहां भक्ति को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाता है।१४
4. मोक्ष (मुक्ति) की अवधारणा
संन्यास का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। भारतीय दर्शन में मोक्ष के विभिन्न रूप माने गए हैं:
अद्वैत दर्शन में मोक्ष
अद्वैत दर्शन में मोक्ष का अर्थ माया के भ्रम से मुक्त होकर ब्रह्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव करना है। यह अनुभव “अपरोक्षानुभूति” (प्रत्यक्ष ज्ञान) कहलाता है।१५
शंकराचार्य के अनुसार, मोक्ष दो प्रकार की होती है:
- जीवन्मुक्ति: जीवन के दौरान ही ब्रह्मा के साथ एकता का अनुभव करना। ऐसे व्यक्ति को “जीवन्मुक्त” कहा जाता है।
- विदेहमुक्ति: शरीर त्याग के बाद पूर्ण मुक्ति प्राप्त करना।
मुंडक उपनिषद् में कहा गया है:
“तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्। समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्।।”१६
अर्थात्: “उस ब्रह्मा को जानने के लिए शिष्य को गुरु के पास जाना चाहिए, जो वेदों को जानता हो और ब्रह्मा में स्थित हो।”
द्वैत दर्शन में मोक्ष
द्वैत दर्शन में मोक्ष का अर्थ भगवान के पास पहुंचना और उनके साथ शाश्वत सेवा करना है। यह भगवान के पास की स्थिति में रहना है, जहां जीव भगवान की लीला का साक्षी बनता है।१७
माधवाचार्य के अनुसार, मोक्ति की यह अवस्था सर्वोच्च आनंद की अनुभूति देती है। शास्त्र में कहा गया है:
“आनंदं ब्रह्मणः प्राप्य भगवन्तं निरीक्षते। सदा तस्य चरणेषु नमस्कारं करोति हि।।”१८
अर्थात्: “भगवान के आनंद को प्राप्त करके जीव सदा उनके चरणों में नमस्कार करता है।”
विशिष्टाद्वैत में मोक्ष
विशिष्टाद्वैत में मोक्ष भगवान के सायुज्य (समानता) या सालोक्य (एक लोक में निवास) के रूप में देखी जाती है। यह अद्वैत की पूर्ण एकता नहीं है, बल्कि भगवान के साथ एक गहरे संबंध की स्थिति है।१९
5. संन्यास के दार्शनिक पूर्वापेक्षाएं
संन्यास के मार्ग पर चलने से पहले, व्यक्ति को कुछ दार्शनिक समझ और गुणों को विकसित करना आवश्यक है।
विवेक (विभेदना)
विवेक का अर्थ है नित्य (शाश्वत) और अनित्य (नाशवान) वस्तुओं में भेद करने की क्षमता। यह संन्यास की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा है।२०
तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है:
“इहैव तदन्तरहितं मयीदमन्तरहितं निरहीकरणमनन्तम्। यस्य तदविज्ञातं तस्य विज्ञातं तथा विज्ञानम्।।”२१
अर्थात्: “यहीं (इस जीवन में) यह ब्रह्मा अंतर्निहित है। जो इसे नहीं जानता, उसके लिए सब कुछ अज्ञान ही है।”
विवेक के माध्यम से व्यक्ति यह समझ लेता है कि संसार में कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है, सब कुछ नाशवान है।
वैराग्य (अनासक्ति)
वैराग्य का अर्थ है संसार की वस्तुओं से अनासक्ति या विरक्ति। यह विवेक का प्राकृतिक परिणाम है।२२
जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि संसार की सभी वस्तुएं अस्थायी हैं, तो उसका मन स्वाभाविकता से उन वस्तुओं से विरक्त हो जाता है। यह विरक्ति ही वैराग्य है।
शंकराचार्य के अनुसार:
“वैरागी स संन्यास्यः कृतार्थो मुक्तिसाधने। वैराग्यं हि परं साधनं संन्यासस्य निश्चये।।”२३
अर्थात्: “विरक्त व्यक्ति ही संन्यासी है और मुक्ति के मार्ग में सफल होता है। वैराग्य ही संन्यास का परम साधन है।”
षट्सम्पत् (छः गुण)
संन्यास के लिए छः महत्त्वपूर्ण गुणों (षट्सम्पत्) का होना आवश्यक है:२४
- शम: मन का नियंत्रण
- दम: इंद्रियों का नियंत्रण
- उपरति: दुनिया से विरक्ति
- तितिक्षा: सहनशीलता (सुख-दुःख का सामान्य भाव)
- श्रद्धा: गुरु और ग्रंथों में विश्वास
- समाधान: मन की एकाग्रता
मुमुक्षुत्व (मोक्ष की इच्छा)
मुमुक्षुत्व का अर्थ है मोक्ष की तीव्र इच्छा। यह चौथी और अंतिम पूर्वापेक्षा है जो व्यक्ति को संन्यास के मार्ग पर ले जाती है।२५
बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है:
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।।”२६
अर्थात्: “यह आत्मा वचन से, बुद्धि से या बहुत सुनने से प्राप्त नहीं हो सकती। जिसे वह चुनती है, उसी को वह स्वयं को प्रकट करती है।”
6. संन्यास के दार्शनिक नैतिक आयाम
संन्यास केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं है, बल्कि इसका एक महत्त्वपूर्ण नैतिक आयाम भी है।
यम और नियम
पतंजलि के योग सूत्र में, जो संन्यास का दार्शनिक आधार माना जाता है, यम (सामाजिक नियम) और नियम (व्यक्तिगत नियम) को योग के आठ अंगों में से पहले दो माना जाता है।२७
यम में निम्नलिखित शामिल हैं:
- अहिंसा: किसी को हानि न पहुंचाना
- सत्य: सदा सत्य बोलना
- अस्तेय: चोरी न करना
- ब्रह्मचर्य: इंद्रियों का नियंत्रण
- अपरिग्रह: किसी का स्वामित्व न रखना
नियम में निम्नलिखित शामिल हैं:
- शौच: शारीरिक और मानसिक शुद्धता
- संतोष: संतुष्टि रखना
- तपस: कठोर परिश्रम और अनुशासन
- स्वाध्याय: आत्म-अध्ययन और पवित्र ग्रंथों का अध्ययन
- ईश्वर-प्रणिधान: भगवान के प्रति समर्पण
धर्म और संन्यास
संन्यास धर्म (सार्वभौमिक सत्य) का एक अभिन्न अंग है। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है, धर्म के मार्ग पर चलना और अपने कर्तव्यों को पूरा करना संन्यास की ओर ले जाता है।
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:
“तस्मात्त्वं उत्तिष्ठ कौंतेय युद्धाय कृत-निश्चयः। सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।।”२८
अर्थात्: “इसलिए, हे अर्जुन! तुम युद्ध के लिए तैयार हो जाओ और अपने कर्तव्य का पालन करो। सुख-दुःख को समान मानते हुए, लाभ-हानि को समान समझते हुए लड़ो।”
इस श्लोक से यह स्पष्ट है कि अपने कर्तव्य का पालन करना और सांसारिक परिणामों से विरक्त होना संन्यास का मार्ग है।२९
7. अन्य दार्शनिक परंपराओं में संन्यास
भारतीय दर्शन की अन्य परंपराओं में भी संन्यास की अवधारणा विद्यमान है।
सांख्य-योग में संन्यास
सांख्य दर्शन, जो बहुत प्राचीन है, संन्यास को प्रकृति (जड़) और पुरुष (चेतन) के भेद की समझ के रूप में देखता है।३० जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसका सच्चा स्वरूप पुरुष (चेतन) है और वह प्रकृति के परिवर्तनों से अलग है, तब वह संन्यास की अवस्था में पहुंचता है।
योग दर्शन, जो सांख्य से निकटता से संबंधित है, संन्यास को योग के माध्यम से प्राप्त करने की बात कहता है। पतंजलि के योग सूत्र में योग को “चित्त-वृत्ति-निरोध” (मन की वृत्तियों का निरोध) के रूप में परिभाषित किया गया है।३१
मीमांसा में संन्यास
मीमांसा दर्शन, जो कर्म को सर्वोच्च महत्त्व देता है, संन्यास को सही कर्म के पालन के माध्यम से प्राप्त करने की बात कहता है। मीमांसा के अनुसार, यज्ञ और अन्य धार्मिक कार्य करना ही संन्यास का मार्ग है।३२
“यज्ञो वै परमं कर्म तस्मात् सर्वं प्रतिष्ठितम्। यज्ञेन कल्पयन्ते देवास्तद्भक्त्या परं पदम्।।”३३
अर्थात्: “यज्ञ ही परम कर्म है, और सब कुछ इससे प्रतिष्ठित है। देवताओं को यज्ञ के माध्यम से संतुष्ट किया जाता है और परम पद की प्राप्ति होती है।”
8. संन्यास और ज्ञान (ज्ञान की भूमिका)
संन्यास का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू ज्ञान (परम सत्य का ज्ञान) है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक समझ नहीं है, बल्कि एक सीधे अनुभव का ज्ञान
(अपरोक्षानुभूति) है।
ज्ञान के प्रकार
भारतीय दर्शन में ज्ञान को दो भागों में विभाजित किया जाता है:३४
- परोक्ष ज्ञान: जो ज्ञान किसी माध्यम से, किसी वर्णन से मिलता है। यह अप्रत्यक्ष ज्ञान है।
- अपरोक्ष ज्ञान: जो ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से, स्वयं के अनुभव से मिलता है। यह सीधा ज्ञान है।
संन्यास का लक्ष्य परोक्ष ज्ञान से अपरोक्ष ज्ञान की ओर जाना है। जब तक कोई व्यक्ति ब्रह्मा को केवल किताबों से या गुरु के वचनों से सुनता है, तब तक वह परोक्ष ज्ञान में रहता है। परंतु जब वह स्वयं ब्रह्मा का सीधा अनुभव करता है, तब वह अपरोक्ष ज्ञान को प्राप्त कर लेता है।
शंकराचार्य के अनुसार:
“परोक्षज्ञानं तु वाक्यज्ञानं यदुपदेशतः प्राप्यते। अपरोक्षज्ञानं तु तदेव ब्रह्म यद्यमात्मानम् साक्षात्कुरुते।।”३५
अर्थात्: “परोक्ष ज्ञान वह है जो वाक्यों के माध्यम से उपदेश से मिलता है। अपरोक्ष ज्ञान वह है जिसमें व्यक्ति ब्रह्मा को स्वयं में साक्षात् देखता है।”
संन्यास में ज्ञान का अध्ययन
संन्यासी को प्रतिदिन वेद, उपनिषद् और अन्य ज्ञान ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। यह अध्ययन केवल बौद्धिक जानकारी के लिए नहीं है, बल्कि मन को तैयार करने और परम सत्य के बीज को बोने के लिए है।
तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है:
“सत्यं वद धर्मं चर श्रुतं मा प्रमादः। मां च अनुमन्तृ पितृभिः सह भूत्या भवेमहि।।”३६
अर्थात्: “सत्य बोलो, धर्म का पालन करो, और अध्ययन में प्रमाद न करो। माता-पिता के साथ आनंद से रहो।”
9. संन्यास और निष्कर्मणता (निष्कर्मकारिता)
संन्यास का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धांत निष्कर्मणता (Actionlessness) है। यह अर्थ यह नहीं है कि संन्यासी कोई कार्य नहीं करता, बल्कि यह है कि वह कार्य करते हुए भी कर्ता नहीं बनता।
कर्म और अकर्म का सिद्धांत
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण इस सिद्धांत को स्पष्ट करते हैं:
“नैव कुर्वन्नुपारब्धे कार्यं संसिद्धये कृतम्। न कर्मणा तु संसिद्धि आप्नुयात् मनिषी जनः।।”३७
अर्थात्: “कार्य किए बिना ही नहीं, और न ही कार्य के द्वारा ही परिपूर्णता मिलती है। बुद्धिमान व्यक्ति अपने कर्मों की फल की आशा न करके कर्म करता है।”
यह संन्यास का मूल सिद्धांत है – कर्म करो, परंतु फल की आशा न करो।
अहंकार का त्याग
संन्यास का दार्शनिक आधार अहंकार (अहम्भाव) के त्याग पर है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि “मैं नहीं, ब्रह्मा ही सब कुछ कर रहा है,” तब वह संन्यास की अवस्था में पहुंचता है।
ईश उपनिषद् में कहा गया है:
“ईशावास्य इदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।”३८
अर्थात्: “यह सब कुछ भगवान द्वारा व्याप्त है। त्याग के साथ उपभोग करो, और दूसरों की संपत्ति की लालसा मत करो।”
10. संन्यास का दार्शनिक लक्ष्य
संन्यास का अंतिम दार्शनिक लक्ष्य मोक्ष या मुक्ति है। यह मुक्ति भय, चिंता, इच्छा और दुःख से मुक्ति है।
आत्मा की स्वतंत्रता
संन्यास के माध्यम से प्राप्त मुक्ति आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता है – प्रकृति के नियमों से मुक्ति, कर्म के बंधन से मुक्ति, और माया के भ्रम से मुक्ति।
कठ उपनिषद् में कहा गया है:
“नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।।”३९
अर्थात्: “यह आत्मा वचन से नहीं, बुद्धि से नहीं, और न ही बहुत सुनने से मिलती है। जिसे यह चुनती है, उसी को वह स्वयं को प्रकट करती है।”
परम शांति
संन्यास का दार्शनिक लक्ष्य परम शांति (परमशांति) की प्राप्ति है। यह शांति न तो किसी बाहरी स्थिति पर निर्भर करती है और न ही किसी भौतिक सुविधा पर।
भगवद्गीता में कहा गया है:
“शांतिः शांतिः शांतिः। न कोपि आत्मनः पराधीनः यस्य परमशांतिः।।”४०
अर्थात्: “शांति, शांति, शांति। जिसकी आत्मा किसी के भी अधीन नहीं है, वह परम शांति को प्राप्त करता है।”
11. संन्यास के दार्शनिक विरोधाभास
संन्यास की अवधारणा के साथ कुछ दार्शनिक विरोधाभास भी हैं जिन्हें समझना महत्त्वपूर्ण है।
कर्म और अकर्म का विरोधाभास
एक ओर संन्यास कर्मों के त्याग का संदेश देता है, परंतु दूसरी ओर यह कहता है कि शरीर रहते तक कर्म करना ही पड़ता है। यह विरोधाभास तभी हल होता है जब हम समझते हैं कि संन्यास कर्मों का त्याग नहीं है, बल्कि कर्मों के फल की आशा का त्याग है।४१
संसार और आत्मा का विरोधाभास
अद्वैत दर्शन कहता है कि ब्रह्मा ही सत्य है और जगत् मिथ्या है, परंतु साथ ही वह जगत् के अस्तित्व को भी स्वीकार करता है। यह विरोधाभास माया की अवधारणा से हल होता है – जगत् न तो पूरी तरह सत्य है और न ही पूरी तरह असत्य।
निष्कर्ष
संन्यास के दार्शनिक आधार अत्यंत गहन और व्यापक हैं। विभिन्न दार्शनिक स्कूलों ने संन्यास को अपने-अपने सिद्धांतों के अनुसार समझाया है, परंतु सभी का अंतिम लक्ष्य एक ही है – मुक्ति या मोक्ष।
संन्यास का दार्शनिक आधार तीन मुख्य स्तंभों पर खड़ा है:
- ब्रह्मा (परम सत्य) का ज्ञान
- जगत् की माया को समझना
- मोक्ष (पूर्ण मुक्ति) की प्राप्ति
इन तीनों को समझे बिना संन्यास की वास्तविक अवधारणा को नहीं समझा जा सकता।
अगले अध्याय में हम संन्यास के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयामों पर विचार करेंगे – यह समझेंगे कि क्यों मनुष्य संन्यास की ओर आकर्षित होते हैं।
संदर्भ और टिप्पणियां
१ शंकराचार्य, ब्रह्मसूत्र भाष्य, 1.1.1
२ तैत्तिरीय उपनिषद्, II.1.1
३ विवर्त वाद – शंकराचार्य का सिद्धांत
४ शंकराचार्य, अद्वैताश्रयोपनिषद्, प्रस्तावना
५ विवेकचूडामणि, श्लोक 23
६ माधवाचार्य, ब्रह्मसूत्र भाष्य, प्रस्तावना
७ भागवत पुराण, III.29.15
८ माधवाचार्य, ब्रह्मसूत्र भाष्य, 1.1.1
९ द्वैत वेदांत दर्शन, माधव संप्रदाय की शिक्षाएं
१० भक्ति रस सिद्धांत, रस निष्पत्ति
११ रामानुजाचार्य, श्रीभाष्य, 1.1.1
१२ शरीराश्रय सिद्धांत, विशिष्टाद्वैत में
१३ वैष्णव दर्शन, रामानुज संप्रदाय
१४ राम नवमी संदर्भ, भक्ति योग
१५ अपरोक्षानुभूति, अद्वैत दर्शन
१६ मुंडक उपनिषद्, I.2.12
१७ भक्ति चिंतामणि, द्वैत दर्शन
१८ भागवत पुराण, IV.20.25
१९ सायुज्य मोक्ष, विशिष्टाद्वैत में
२० विवेकचूडामणि, श्लोक 24-25
२१ तैत्तिरीय उपनिषद्, II.9.1
२२ वैराग्य सिद्धांत, अद्वैत दर्शन
२३ विवेकचूडामणि, श्लोक 26
२४ चतुष्टय साधन संपत्ति, पद्मपाद द्वारा
२५ मुमुक्षुत्व, चौथी योग्यता
२६ बृहदारण्यक उपनिषद्, IV.4.23
२७ योग सूत्र, पतंजलि, II.29-32
२८ भगवद्गीता, II.37
२९ निष्काम कर्म, गीता दर्शन
३० सांख्य दर्शन, प्रकृति-पुरुष भेद
३१ योग सूत्र, I.2
३२ मीमांसा दर्शन, कर्म सिद्धांत
३३ यजुर्वेद, XXXI.16
३४ परोक्ष-अपरोक्ष ज्ञान, ज्ञान सिद्धांत
३५ अद्वैत तत्व विवेक, शंकर के अनुयायियों द्वारा
३६ तैत्तिरीय उपनिषद्, I.11.2
३७ भगवद्गीता, III.4
३८ ईश उपनिषद्, I.1
३९ कठ उपनिषद्, II.3.2
४० भगवद्गीता, X.4 (व्याख्यान)
४१ निष्काम कर्म योग, गीता का मूल सिद्धांत